सियासी जंग:सचिन पायलट और अशोक गहलोत में अब आर-पार की लड़ाई छिड़ी

भास्कर ओपिनियनसियासी जंग:सचिन पायलट और अशोक गहलोत में अब आर-पार की लड़ाई छिड़ी

राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई अब हर हाल में आर-पार के युद्ध में तब्दील हो चुकी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान के जवाब में आख़िरकार उनके जूनियर नेता सचिन पायलट भी फट पड़े। सचिन ने पहली बार गहलोत पर सीधे वार किए। वार और व्यंग्य पहले भी वे कर चुके हैं लेकिन बचकर, इधर- उधर से करते रहे हैं।

इस बार ऐसा नहीं है। पहले गहलोत ने कहा था कि भाजपा से जिन कांग्रेस विधायकों ने पैसा ले रखा है, वे उसे लौटा दें, क्योंकि किसी का पैसा रखना नहीं चाहिए। पैसा किसी और का हमारे पास हो तो हम खुलकर काम नहीं कर पाते। एक तरह का दबाव हम पर हमेशा बना रहता है। जवाब में सचिन ने भयंकर पलटवार किया। कहा- जो मुख्यमंत्री अपने ही विधायकों पर इस तरह के आरोप लगाता फिरे, उससे आख़िर क्या और किस तरह की उम्मीद की जा सकती है? आरोप भी उन विधायकों पर, जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री की इस कुर्सी तक पहुँचाया।

इतना ही नहीं, सचिन ने यहाँ तक कह दिया कि जिनका पूरा जीवन ही पैसे के दम पर टिका हो, उन्हें उम्रभर पैसे के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। इसलिए मुख्यमंत्री ऐसा कह रहे हैं तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है।

सचिन ने पहली बार गहलोत पर निशाना साधते हुए कहा कि अपने ही विधायकों पर आरोप लगाने वाले मुख्यमंत्री से क्या उम्मीद की जा सकती है।

सचिन ने पहली बार गहलोत पर निशाना साधते हुए कहा कि अपने ही विधायकों पर आरोप लगाने वाले मुख्यमंत्री से क्या उम्मीद की जा सकती है।

सचिन इस बार गहलोत के बयानों से बुरी तरह आहत दिखे। उन्होंने कहा हम भी बड़े-बड़े पदों पर रहे हैं। हम भी वर्षों से सार्वजनिक जीवन में हैं। आरोप लगाना हमें भी आता है। ज़ुबान हम भी खोल सकते हैं। लेकिन हम गालियाँ खा-खाकर भी चुप रहे। क्योंकि हमें संयम में रहना आता है। बार-बार अपने ही विधायकों पर आरोप लगाते रहकर आख़िर आप करना क्या चाहते हैं? किसे और क्या दिखाना चाहते हैं? कुछ तो स्पष्ट कीजिए! आख़िर इस उल्टी धारा का कोई तो अर्थ होगा? अगर है तो समझाइए। हम समझने को तैयार हैं। सचिन ने कहा- मैं डिप्टी सीएम था। मुझ पर राष्ट्रद्रोह की धारा तक लगाने की कोशिश की गई।

आख़िर मेरा क़सूर क्या था? हम दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान को शिकायत करने जा रहे थे तो दो साल से मानेसर-मानेसर चिल्ला-चिल्लाकर हमें बेइज्जत किया जा रहा है। कब तक सहें? क्यों सहें? हम भी पार्टी के सिपाही हैं। कार्यकर्ता हैं! क्यों चुप रहें? और कब तक?

ख़ैर यह हुई सचिन की बात, अब जिस मानेसर के नाम पर सचिन इतने आग बबूला हो रहे हैं, वह इतनी सीधी बात भी नहीं थी, जितने सीधे तरीक़े से सचिन ने बताई। कुछ तो गड़बड़ थी। क्या थी, ये सचिन और गहलोत से ज़्यादा तो कोई नहीं जानता। लेकिन सच यह है कि अब सचिन-गहलोत की लड़ाई जिस मुक़ाम पर पहुँच गई है, वहाँ किसी तरह के कोई समझौते की गुंजाइश नहीं रह गई है। अब न कोई पक्ष झुकने वाला है और न किसी मोड़ पर कोई पक्ष रुकने वाला है।

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